वैश्विक आर्थिक संकट भाग 2

शशांक शर्मा :
                         
लॉकडाउन में सुने पड़े पर्यटन स्थल 
महान अवसाद भाग 2 :
        विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के कारण विश्व अर्थव्यवस्था एक वैश्विक आर्थिक संकट का रूप ले रही है। संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग (UNDESA) का एक नया विश्लेषण दर्शाता है कि अगर लोगों की आवाजाही और आर्थिक गतिविधियों पर पाबंदियों की मियाद बढ़ती है और पर्याप्त वित्तीय उपाय नहीं किए गए तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कोरोनावायरस का असर और भी ज़्यादा व्यापक हो सकता है। हमें इस लोकडाउन के अंदर कई प्रकार के अवसाद देखने को मिले जैसे बेकारी की समस्या, आत्महत्या एवं आत्महत्या के प्रयास, घरेलू उत्पीड़न, कलह , विद्रोह के मामले आदि। वर्तमान संदर्भ में इस समस्या से निपटने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है, किंतु देश विदेशों की सरकारें असमर्थ दिखाई देती है। सरकारें अपने ढंग से स्थिति में सुधार लाने के प्रयास कर रही है । कोरोनावायरस की वैक्सीन बनाने से संबंधित, आर्थिक सुधार एवं विदेशी व्यापार से संबंधित, व पर्यटन स्थलों को शुरू करने , पर्यटक को बढ़ावा देने हेतु आर्थिक प्रयास किए जाएंगे।
वैश्विक महामारी में यदि इस अवसाद में चिंतन करे तो जनता के मध्य एक विशेष प्रकार का डर पाएंगे आर्थिक मूलक सुधारों के लिए घातक है। कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया भीषण वैश्विक मंदी की चपेट में आ रही है।यह मंदी ऐसी होगी जिसे अब तक हमने न सुना है और न पढ़ा है। यह बात विश्व व्यापार संगठन (WTO) के प्रमुख रॉबर्टो एजेवेदो ने कही है।

उन्होंने जिनेवा में ऑनलाइन आयोजित इस प्रेस कांफ्रेंस में आगाह किया कि हम आज जिसका सामना कर रहे हैं, उससे विश्व भीषण आर्थिक मंदी में जा सकता है। यह मंदी ऐसी होगी जिसके बारे में हमने अबतक न पढ़ा है और न सुना है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि सतत आर्थिक वृद्धि के लिए जो भी उपाय हैं, उनका इस्तेमाल करें ताकि मौजूदा हालतों में बदलाव लाया जा सके।विश्व व्यापार संगठन के प्रमुख ने यह भी कहा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण 2020 में वैश्विक व्यापार में एक तिहाई तक की गिरावट आने की आशंका है। उन्होंने कहा कि आंकड़ें काफी खराब होंगे. डब्ल्यूटीओ ने कहा, ‘‘विश्व व्यापार में 2020 में 13 फीसदी से लेकर 32 फीसदी तक की गिरावट आने की आशंका है।
इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की समस्या, शिक्षा संबंधित क्षेत्र विकराल रूप से प्रभावित हुए हैं । देखा जाए तो यह आर्थिक मंदी 1929/1930 के " महान अवसाद भाग 1" से भी गंभीर मालूम पड़ती है। उस समय कृषि प्रधान देशों ऊपर इतना आर्थिक संकट का असर नहीं पड़ा जितना वर्तमान समय में।

 विश्व स्तर पर कोरोना वायरस के वर्तमान एवं बाद में प्रभाव :


नोवेल कोरोना वायरस संक्रमण के कुछ इक्के-दुक्के मामले सबसे पहले चीन में सामने आए और उसके कुछ माह बाद ही देखते-देखते इसने वैश्विक महामारी का रूप धारण कर लिया। इस महामारी के कारण वैश्वीकृत दुनिया की एक दूसरे के साथ मजबूती से जुड़ी हुई प्रणालियां पूरी तरह से बदल गई है। इस वायरस के प्रकोप पर काबू करने के प्रयास के तौर पर अलग-अलग देशों की सरकारों ने आने-जाने तथा सामाजिक मेल-जोल पर बंदिशें लगा दी जिसके कारण दुनिया की 7.8 बिलियन की आबादी में से एक तिहाई से अधिक आबादी इस समय इस महामारी के कारण एक तरह से अपने घरों में बंद रहने को मजबूर है।

कोरोना वायरस की महामारी के कारण वैश्विक स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है और अनेक लोगों के लिए लॉकडाउन नया ‘नियम’ बन गया है और अब यह धारणा तेजी से बन रही है कि आने वाले समय में जब तक कोरोना वायरस खत्म होगा तब तक दुनिया की सूरत हमेशा-हमेशा के लिए बदल जाएगी।

आज इस बात को लेकर आम सहमति है कि अगले डेढ़ से दो साल तक पूरी दुनिया किसी न किसी रूप से संभवतः कोविड-19 के तात्कालिक खतरे से ही जूझती रहेगी और उसके बाद भी पुनर्निर्माण और इसके स्थाई प्रभाव निःसंदेह कई वर्षों तक महसूस किए जाते रहेंगे। दुनिया के कई हिस्सों में, सीमाएं बंद हैं, हवाई अड्डे, होटल और व्यवसाय बंद हैं, और शैक्षणिक संस्थान बंद हैं। ये अभूतपूर्व उपाय कुछ समाजों के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ रहे हैं और कई अर्थव्यवस्थाओं को बाधित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर लोगों की नौकरियां छूट रही है और व्यापक पैमाने पर भूख की छाया बढ़ रही है।

वर्तमान में, कई लोगों को यह पता नहीं है कि यह संकट किस रूप में सामने आएगा। आज की सर्वोच्च प्राथमिकता जीवन बचाना है (जान है तो जान है)। और जीवन बचाने का यह उद्देश्य भविष्य की सफलता है। लेकिन भविष्य में सफल होने के लिए, दुनिया भर के देशों को इसके लिए योजना बनानी चाहिए। हमें आज द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ समझ में आते हैं, लेकिन अगर कोरोना वायरस एक युद्ध है तो उस वायरस से लड़ा नहीं जा सकता और न ही उसे मारा जा सकता है। युद्धकाल के दौरान शत्रु अक्सर अप्रत्याशित होते हैं, लेकिन वे शायद ही कभी अदृश्य होते हैं। फिर भी, किसी युद्ध में अगर विजय हासिल करना हो तो विवेकपूर्ण योजना बनाना जरूरी है।

जैसे-जैसे यह महामारी दुनिया में बंद की स्थिति पैदा कर रही है वैसे-वैसे दो समान पहलू उभर रहे हैं।

(क) पहला तो यह कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है जिसके दो साल तक जारी रहने की संभावना है। जब तक इसकी वैक्सीन विकसित नहीं होगी तब तक यह वायरस एक खतरा बना रहेगा क्योंकि अलग-अलग देष इस वायरस के नए संक्रमणों के चक्र पर काबू पाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे और इस तरह से उनकी स्वास्थ्य प्रणालियों पर दवाब बना रहेगा। वैक्सीन के विकास, इसके उत्पादन और न्यायसंगत वितरण की बाधाओं को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास की भी आवश्यकता है। गहन चिकित्सा की आवश्यकता वाले तेजी से बढ़ रहे रोगियों का इलाज करने के लिए मास्क से लेकर वेंटिलेटर तक की जरूरी सामानों के उत्पादन एवं उनकी आपूर्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को युद्ध स्तर पर तैयार रखा जाना चाहिए।

(ख) चीन को निर्यात बाजारों के लुप्त होने और आपूर्ति श्रृंखलाओं से बाहर होने के खतरे का सामना करना पड़ रहा है और वैसे में इस संक्रामक बीमारी के कारण उत्पन्न दूसरे क्रम के प्रभाव वैश्विक वित्तीय बाजारों को तेजी से तबाह कर सकते हैं। कोविड-19 ने न केवल संपत्ति की कीमतों और शेयर बाजारों को ध्वस्त कर दिया है, बल्कि वास्तविक जीवन और वास्तविक गतिविधियों को भी बुरी तरह से प्रभावित किया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि दुनिया मंदी की स्थिति में जा चुकी है, अगले साल इस मंदी के पूरा स्वरूप ग्रहण कर लेने की संभावना है। वैश्विक जीडीपी 2021 के लिए अनुमान 2.5 प्रतिशत से नीचे आ गए हैं। जब उत्पादन रुक जाता है, तो यही अपेक्षित परिणाम होता है। व्यवसायिक संचालन को बंद करने के लिए विवष होना पड़ा है जिसके कारण हर जगह उत्पादन में गिरावट हुई है

कोविड-19 सार्वजनिक सेवाओं सहित सभी सेवाओं की चैथी औद्योगिक क्रांति और डिजिटलाइजेशन को तेजी से आगे बढ़ाएगा। समुदाय और राज्य के बीच संबंधों में पहले की तुलना में अधिक दूरी आएगी और जिसके कारण राज्य सिविल सोसायटी और निजी जीवन पर अपने रिमोट कंट्रोल का विस्तार करेंगे.


भारत के संदर्भ में महामारी का असर :

भारत के असंगठित क्षेत्र के अप्रवासी कामगारों की बड़ी तादाद, कोरोना वायरस के आर्थिक प्रकोप का शिकार हो रही है। अत: रोज़गार, जिनमें पहले ही कम मज़दूरी मिलती थी। जिन लोगों को सामाजिक संरक्षण नहीं प्राप्त था, वो इस महामारी की चक्की में पिस रहे हैं। हमें उम्मीद है कि भारतीय सरकार और हमारा समाज इस संकट को एक अवसर के रूप में देखेगा। और ये ठानेगा कि हमारे देश में जो बहुत से सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएं हैं, उन्हें दूर किया जाएगा। भारत ने कोरोना वायरस की महामारी को लेकर सार्क देशों के बीच सहयोग की जो पहल की। और फिर G-20 देशों को एक साथ लाने में अग्रणी भूमिका निभाई। उससे ये स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि भारत वैचारिक और राजनीतिक विविधताओं के समीकरणों के बीच अपनी भूमिका बहुत अच्छे तरीक़े से निभा सकता है. भारत को ऐसा प्रयास अपने घरेलू राजनीतिक परिदृश्य में भी करने की भी आवश्यकता है।

बहुत से देशों को इस महामारी में एक अवसर मिल गया है कि वो विश्व समुदाय के लिए अपने दरवाज़े बंद कर लें। बाक़ी दुनिया से ख़ुद को काट लें, भारत को ऐसी आकांक्षाओं का दमन करना चाहिए। इस मुश्किल समय में भारत का नेतृत्व और वैश्विक प्रशासन को लेकर नई प्रतिबद्धता, दुनिया के लिए एक ऐसी वैक्सीन का काम करेगी, जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को नए दशक की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति प्रदान करेगी।

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